नन्हेसे कदमोंको जब चलना तक ना आता था,
तबसे कोई उंगली थामे खड़ा है,
तबसे कोई कदमोंका सहारा बन खड़ा है।
चलनेकी सिख बनकर खड़ा है,
दौड़ का ख्वाब लेकर खड़ा है।
इक लफ्ज तक बोलना ना आता था,
तबसे कोई जुबां बन खड़ा है,
पा-पा सुनने के लिए खड़ा है,
अपने नाम की गुंज पर मुस्कुराता खड़ा है,
अपनी जुबां देकर, हमें अपनी जुबां बनाने खड़ा है।
ना थी दुनिया की समझ, ना किसीकी फिकर
तबसे हमारी फिकर में कोई खड़ा है।
समाज को समझाता, दुनिया की फितरत में कोई खड़ा है।
दुनिया के अच्छाई की, समाज के सच्चाई की सिख बनकर खड़ा है।
बुराई के ड़र से, झूठ के कहर से बचाने कोई खड़ा है।
कोई खड़ा है ना शौक से ना शौकत से,
वो खड़ा है बस एक बाप बनकर।
शूल सा कठोर बनकर, बिजली की धार बनकर।
हर चोट पर मरहम बनकर, हर मरहम का असर बनकर।
वो बस खड़ा है अपने लिए नही अपनों के लिए,
अपनोने देखे सपनो के लिए।
वो खड़ा है वृक्ष सा, बस देने की चाह लेकर
हर मंजिल की राह लेकर,
अपनी ईच्छा, आकांक्षा सभीको दाह देकर,
वो खड़ा है इक वटवृक्ष बनकर।
उनकी शीतल छाव, उनकी अमोघ माया
संकट की रात मे जिसका साथ वो अविरत छाया
वो प्यार का सागर, वो ममता का झरना
उन्हीसे सब,उन्हीका सब, गुमनाम सा बस इक निशान वरना
