Tuesday, 1 September 2020

"सही वक्त"



 20 तक पढाई - 23 तक सेटलमेंट - 25 तक शादी - 28 तक बच्चे
इसे वे सही वक्त कहते हैं ..।
"समय रहते सब हो जाएँ तो बेहतर है..", ऐसी सोच रखते हैं.. 
खैर इसमें कोई खराबी नहीं ।
पर "जो इस सोच से परे है वे गलत" इस बात से मुझे परेशानी हैं।

सही समय की पाबंदी मिडीऑकर रखते हैं, 
जिनकी राहे औरों से जुदा है, उनके रास्ते आम नहीं हो सकते।
जिनके सपने बड़े होते हैं, वे बाॅक्स के अंदर खडे नहीं होते ।

"हाँ, सत्ताइस की हूँ और अब भी कुँवारी हूँ..।"
क्योंकि, मेरे मम्मा पापा ने मुझे दुनिया की तौर तरीकों से बडा नहीं किया..
लडकी हूँ इस बात का हर घड़ी एहसास नहीं दिलाया..
उन्होंने मुझे साॅफ्ट स्पोकन येट अ डिसीजन मेकर बनाया..
पोलाईटनेस के साथ प्राइड भी सिखाया..

देखो भाई, सिंपल सी बात है..
"एक्सट्रा ऑर्डीनरी पॅरेंटींग रेजेस् एक्सट्रा ऑर्डीनरी किडस्
एन्ड एक्सट्रा ऑर्डीनरी पीपल डोन्ट लीड एन ऑर्डीनरी लाईफ"
सो, आय डोन्ट बिलीव्ह इन "सही वक्त" स्टफ

माय फंडा इज-
• किसी और के नाम से जुड़ने से पहले, अपना नाम तो कमालु..
• किसी और की अर्धांगनी बनने से पहले, पुरी तरह अपनी तो हो लू..
• कल संकट की घड़ी में उसके कंधे से कंधा लगा सकूं,
खुद को उतना क़ाबिल तो बना लु..
• कल जितने अभिमान से मैं उसे अपने दोस्तों से मिलांऊ,
उतने अभिमान का हकदार अपने आप को भी तो बनाऊं..
भाई, चार पहियों की गाडी है ये,
एसयुव्ही के दो पहियों से स्कुटी के पहियें कैसे लगाऊं..??

मेरी 👆 बात हर किसी के पल्ले पड़ेगी.. ऐसी उम्मीद भी नही है..
क्योंकि, चांद को देखने के लिए स्पेसशीप ना सही,
पर एटलीस्ट एस्ट्रोनाॅमी बायनॅकुलर्स तो चाहिए ना..

डिअर पॅरेन्टस्, 
अगर सही मायने में अपने बच्चों का भला चाहते हो तो 
सही वक्त नही सही परवरिश की मिसाल रखें..
उन्हें आजादी दे, रिस्पाॅसीबीलीटी का एहसास उन्हें अपने आप होगा..
आप उन्हें चीजों के सही-गलत पैमाने जरूर बताएं..
पर फैसले लेने का हक़ मत छीनें..
अगर अपनी परवरिश पर भरोसा है, तो उनके फैसलोंपर भी भरोसा रखिए ..
कल जाके वे गलत भी साबित हो तो उसका जिम्मा खुद लेंगे
ना की जिंदगी भर आपको कोसेंगे..।

अपने बच्चों को इस "सही वक्त" के सोशल प्रेशर से दूर रखें
क्योंकि सही बात के लिए कोई सही वक्त नहीं होता,
और सिर्फ वक्त देखकर लिया फैसला हमेशा सही नहीं होता..।

Tuesday, 28 April 2020

कहाणी लाॅकडाऊन की


“सपनों का शहर सो रहा है”, ऐसा तो पहली बार ही हो रहा हैं। घड़ीके काटों पर जो भगाता था, वो वक्त लगता है जैसे थमसा गया है।
"आजादी" खोई इस महामारीके दौरमें, पर काफी कुछ पाया भी हैं। रोजगार गवाया है, पर फिरभी कुछ कमाया है।

ईंट से ईंट जोड़कर मकान बना लिया था, आज पुरा परिवार साथमें बैठा तो “घर” बन गया। 
जिन्होंने खो दिया था बचपन, रोज मर्राकी जिंदगीके चलते, वे दिखाई देते है बच्चोंके साथ खेलते। मानो जैसे जिंदगीने दुसरा मौका दिया हो, अनमोल लम्होंको फिरसे जीने के लिए। 
भूक लगने पर जो उंगलियां मोबाइलपर घूमती, वो आजकल आटा गुनने लगी हैं। नेटफ्लिक्स, प्राईम व्हिडीओ की जनरेशन यूट्यूब पर दादी की रेसीपी ढूंढने लगी हैं। 
बच्चे पालनाघरमें नहीं, अपने घरोंमें खेल रहें हैं। A-B-C-D नहीं, रामायण-महाभारत के पाठ पढ़ रहें है।

वैसे देखा जाए तो, सुनहरी है ये कैद, पर "जबरदस्ती" रास कहाँ आती है, फिर वो आराम की ही क्यूँ ना हो। तभी तो आरामसे दुनिया थक गयी हैं, जिससे फ़ुरसत चाहते थे, उसी काम की कमी खल रही हैं।

विपदाकी घड़ीमें इन्सान की नस्ल का अनोखा परिचय हो रहा है। कहीं “संयम का पालन”, कहीं “मूर्खता का प्रदर्शन” हो रहा है। कोई जान बचाने में जुटा है, कोई लुटाने पर अड़ा है, कुछ अपनों से दूर हैं कर्तव्यपालन के लिए, वहीं ऐसे भी हैं कुछ अक्ल के अंधे, जो अपनेही घर में नहीं रह पाते। 

खैर “आगे क्या होगा?” ये तो वक्त ही बताएगा, “पर कब?” ये सवाल हर वक्त सताएगा।

Wednesday, 8 April 2020

लग्न- नातं कि बंधन..


मैत्री चं स्थान या जगात इतकं उच्च का आहे माहितीये??
कारण ती रंग-वर्ण, जात-पात बघून जोडली जात नाही तर स्वभाव आणि विचारांवर आधारलेली असते..

तिथे सौदा नसतो, ती अगदी साधी असते,
तिथे औदा न बघता परस्पर आदर जपला जातो.
ती निखळ असते, निर्विकार असते..
जिथे कृष्ण राजा नसतो, सुदामा शूद्र नसतो ती एकमात्र मैत्री असते.

मैत्री ची जागा कोणतंच नातं घेऊ शकत नाही.
कारण ती नाळेनं जोडली, म्हणून सख्खी असत नाही.
ती जन्मजात मिळत नाही... मन जिंकून जोडावी लागते...
ती जबरदस्ती बांधलेलं बंधन नसते, ती मनापासून निभावलेलं नातं असते...

मग प्रश्न पडतो कि आयुष्यभर जे नातं जपायचंय ते "लग्न", मैत्रीत करावं कि नातलगात??
जिथे नाडी-पत्रिका जुळते तिथे बांधावं कि जिथे मनं जुळतात तिथे जोडावं??
जिथे जात मिळते तिथे टिकेल कि जिथे स्वभाव आणि विचार जुळतात तिथे बहरेल??

सगळ्या गोष्टी चोखंदळासारखे निवडणारे आपण स्टेटस लेबलस् आणि जातीचे टॅगज् बघून "लग्न बंधन" जोडतो हे विडंबन नाही तर काय??
माणूस म्हणून पारख करण्यापूर्वीच जे वर्थलेस फिल्टरस् आपण लावतो त्याने काय साध्य करतो??

अहो, मनं तोडून घरं जोडली जातात का कधी??
लग्न प्रतिष्ठेसाठी नव्हे तर पूरकतेसाठी करायला हवं.. ज्याला दोन जीवांचा मेळ म्हटलं जातं ते कुणाच्या अंतर्मनाच्या राखेची साक्ष देत असेल तर काय अर्थ त्या नवजीवनाला??