Tuesday, 28 April 2020

कहाणी लाॅकडाऊन की


“सपनों का शहर सो रहा है”, ऐसा तो पहली बार ही हो रहा हैं। घड़ीके काटों पर जो भगाता था, वो वक्त लगता है जैसे थमसा गया है।
"आजादी" खोई इस महामारीके दौरमें, पर काफी कुछ पाया भी हैं। रोजगार गवाया है, पर फिरभी कुछ कमाया है।

ईंट से ईंट जोड़कर मकान बना लिया था, आज पुरा परिवार साथमें बैठा तो “घर” बन गया। 
जिन्होंने खो दिया था बचपन, रोज मर्राकी जिंदगीके चलते, वे दिखाई देते है बच्चोंके साथ खेलते। मानो जैसे जिंदगीने दुसरा मौका दिया हो, अनमोल लम्होंको फिरसे जीने के लिए। 
भूक लगने पर जो उंगलियां मोबाइलपर घूमती, वो आजकल आटा गुनने लगी हैं। नेटफ्लिक्स, प्राईम व्हिडीओ की जनरेशन यूट्यूब पर दादी की रेसीपी ढूंढने लगी हैं। 
बच्चे पालनाघरमें नहीं, अपने घरोंमें खेल रहें हैं। A-B-C-D नहीं, रामायण-महाभारत के पाठ पढ़ रहें है।

वैसे देखा जाए तो, सुनहरी है ये कैद, पर "जबरदस्ती" रास कहाँ आती है, फिर वो आराम की ही क्यूँ ना हो। तभी तो आरामसे दुनिया थक गयी हैं, जिससे फ़ुरसत चाहते थे, उसी काम की कमी खल रही हैं।

विपदाकी घड़ीमें इन्सान की नस्ल का अनोखा परिचय हो रहा है। कहीं “संयम का पालन”, कहीं “मूर्खता का प्रदर्शन” हो रहा है। कोई जान बचाने में जुटा है, कोई लुटाने पर अड़ा है, कुछ अपनों से दूर हैं कर्तव्यपालन के लिए, वहीं ऐसे भी हैं कुछ अक्ल के अंधे, जो अपनेही घर में नहीं रह पाते। 

खैर “आगे क्या होगा?” ये तो वक्त ही बताएगा, “पर कब?” ये सवाल हर वक्त सताएगा।

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